धृतराष्ट्रस्य पश्चात्तापः तथा वनप्रस्थानानुज्ञा | Dhṛtarāṣṭra’s Remorse and Request for Forest-Retirement
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपव॑के अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यायकी आज्ञाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ,उस समय उनके पीछे-पीछे ज्ञानी विदुर, सारथि संजय तथा शरद्वानके पुत्र महाधनुर्धर कृपाचार्य भी गये ।। स प्रविश्य गृहं राजन् कृतपूर्वाल्निकक्रिय: । तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठानाहारमकरोत् तदा राजन! घरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्लकालकी धार्मिक क्रिया पूरी की; फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अन्न-पान आदिसे तृप्त करके स्वयं भी भोजन किया
sa praviśya gṛhaṃ rājan kṛta-pūrvāhṇika-kriyaḥ | tarpayitvā dvija-śreṣṭhān āhāram akarot tadā ||
ヴァイシャンパーヤナは言った。王よ、彼は家に入り、午前に定められた宗教的務めを果たしたのち、最上のバラモンたちを食と飲み物で満ち足らせた。しかる後、しかるべき順序に従って、自らも食事をとった。
वैशम्पायन उवाच