Bhāgīrathī-tīra-śauca, Kurukṣetra-gamana, and Śatayūpa-āśrama-dīkṣā (गङ्गातीरशौच–कुरुक्षेत्रगमन–शतयूपाश्रमदीक्षा)
यदर्थो हि नरो राजंस्तदर्थो5स्यातिथि: स्मृतः । इत्युक्त: स तथेत्येवं प्राह धर्मात्मजो नृपम्,“राजन! मनुष्य जिन वस्तुओंका स्वयं उपयोग करता है, उन्हीं वस्तुओंसे वह अतिथिका भी सत्कार करे--ऐसी शास्त्रकी आज्ञा है।” उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने “बहुत अच्छा” कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उनके दिये हुए फल- मूलका भाइयोंसहित भोजन किया। तदनन्तर उन सब लोगोंने फल-मूल और जलका ही आहार करके वृक्षोंके नीचे ही रहनेका निश्चय कर वहीं वह रात्रि व्यतीत की
yad-artho hi naro rājan tad-artho 'syātithiḥ smṛtaḥ | ity uktaḥ sa tathety evaṁ prāha dharmātmajo nṛpam |
ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、掟はこうである。人が自らの用に供するもの、その同じものをもって客人をもてなすべし――これがシャーストラの定めである。」そう言われると、ダルマラージャ・ユディシュティラは「そのとおりに」と答えて教えを受け入れ、兄弟たちとともに供された果実と根を食した。その後、彼らは皆、木々の下に住むことを決め、果実と根と水のみで身を養い、その夜をそこで過ごした――質素と歓待とをダルマの行として抱きしめながら。
वैशम्पायन उवाच