धृतराष्ट्रस्य वनप्रस्थानम् — Dhṛtarāṣṭra’s Departure for Forest Life
प्रासादहर्म्यसंवृद्धामत्यन्तसुखभागिनीम् । कदा तु जननीं श्रान्तां द्रक्ष्यामि भूशदु:खिताम्,“जो महलों और अट्ठटालिकाओंमें पलकर बड़ी हुई हैं, अत्यन्त सुखकी भागिनी रही हैं, वे ही माता कुन्ती अब थककर अत्यन्त दुःख उठाती होंगी! मुझे कब उनके दर्शन होंगे?
「宮殿や高楼に育ち、かつてはこの上ない安楽に恵まれていたその母クンティーが、今は疲れ果て、地にあって深い苦しみを受けているに違いない。私はいつ彼女を拝せるのだろうか。」
वैशम्पायन उवाच