धृतराष्ट्र-सत्कारः तथा श्राद्ध-दाने नियमनम् | Honoring Dhṛtarāṣṭra and Regulating Śrāddha-Gifts
यद् यद् ब्रूते च किंचित् स धृतराष्ट्री जनाधिप:,विपरीतकश्न मे शत्रुर्नियम्यश्न भवेन्नर: । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि “ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है। विपरीत आचरण करनेवाला मेरा शत्रु है। वह मेरे दण्डका भागी होगा पूजयित्वा वचस्तत् तदकार्षीत् परवीरहा । महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते, पाण्डवधुरन्धर शत्रुसूदन राजा युधिष्ठिर उनके उस आदेशको सादर शिरोधार्य करके वह सारा कार्य पूर्ण करते थे
vaiśaṃpāyana uvāca |
yad yad brūte ca kiṃcit sa dhṛtarāṣṭrī janādhipaḥ |
viparītakaś ca me śatrur niyamyas ca bhaven naraḥ ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。「民の主たるドリタラーシュトラ王が、いかなる事にせよ命ずるところ、これに従う者はわたしの善意の友と見なされるべきである。だが、その言葉に背く者はわたしの敵であり、抑えられ、戒められねばならぬ。」このようにユディシュティラは、常に柔和で沈着でありながら、公然と自らの権威を老王への敬意に結びつけ、ドリタラーシュトラへの服従を忠誠とダルマの尺度とした。
वैशम्पायन उवाच