Śama-prāptiḥ — Gautamī–Lubdhaka–Pannaga–Mṛtyu–Kāla-saṃvāda
Restraint through the Analysis of Karma and Time
गौतग्युवाच का नु प्राप्ति्गहा शत्रुं निहत्य का कामाप्ति: प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा । कस्मात् सौम्याहं न क्षमे नो भुजड़े मोक्षार्थ वा कस्य हेतोर्न कुर्यामू,गौतमी बोली--अर्जुनक! शत्रुको कैद करके उसे मार डालनेसे क्या लाभ होता है; तथा शत्रुको अपने हाथमें पाकर उसे न छोड़नेसे किस अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्पके अपराधको क्षमा न करूँ? तथा किसलिये इसको छुटकारा दिलानेका प्रयत्न न करूँ?
Gautamy uvāca: kā nu prāptir gṛhā śatruṁ nihatya, kā kāmāptiḥ prāpya śatruṁ na muktvā? kasmāt, saumya, ahaṁ na kṣame no bhujaṅgaṁ; mokṣārthaṁ vā kasya hetoḥ na kuryām?
ガウタミーは言った。「敵を捕らえて殺して、いかなる利があろう。敵を手中に収めながら放たぬことで、どの願いが成就するというのか。やさしき人よ、なぜ私はこの蛇の罪を赦してはならぬのか。誰のために、私はその解放を求めて努めてはならぬのか。」
लुब्धक उवाच