Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुला: समा: । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रत:,वहाँ मैं विनीत हृदयसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सिरपर जटा धारण किये बहुत वर्षोतक रहा। गुरुकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहकर मैंने दीर्घकालतक उनके आश्रममें निवास किया
vaiśampāyana uvāca | brahmacārī vinītātmā jaṭilo bahulāḥ samāḥ | avasaṃ suciraṃ tatra guruśuśrūṣaṇe rataḥ ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。戒律を守る梵行者として、心は謙虚に、髪はジャターに結い、私はそこに幾年も留まった。師への奉仕に身を捧げ、師の庵に久しく住み、怠らず侍し、従順に従った。
वैशम्पायन उवाच