दक्षिणदिशि तीर्थवर्णनम्
Southern Tīrthas: Godāvarī to Dvāravatī
निसृष्ट इव कालेन युगान्ते ज्वलनो महान् | मम सैन्यमयं कक्ष प्रधक्ष्यति न संशय:,“कालने उसे प्रलयकालीन संवर्तक नामक महान् अग्निके समान उत्पन्न किया है। अस्त्रोंका वेग ही उसका वायुतुल्य बल है। बाण ही उसकी ज्वाला हैं। हथेलीसे होनेवाली आवाज ही उस दाहक अग्निका शब्द है। युद्धमें उठनेवाली धूल ही उस कर्णरूपी अग्निका धूम है। अस्त्रोंकी वर्षा ही उसकी लपटोंका लगना है। धृतराष्ट्र-पुत्ररूपी वायुका सहारा पाकर वह और भी उद्धत एवं प्रज्वलित हो उठा है। इसमें संदेह नहीं कि वह मेरी सेनाको सूखे तिनकोंकी राशिके समान भस्म कर डालेगा
vaiśampāyana uvāca |
nisṛṣṭa iva kālena yugānte jvalano mahān |
mama sainyamayaṃ kakṣa pradhakṣyati na saṃśayaḥ ||
Vaiśampāyana said: “As if unleashed by Time itself, like the great fire that blazes at the end of an age, he will surely burn up the thicket that is my army—there is no doubt.”
वैशम्पायन उवाच