भयात् त्रस्यसि यच्च त्वमाह्नयिष्यति मां पुनः । अक्षज्ञ इति तत् ते5हं नाशयिष्यामि पार्थिव,राजन! तुम जो इस भयसे डर रहे हो कि कोई द्यूतविद्याका ज्ञाता मनुष्य पुनः मुझे जूएके लिये बुलायेगा (उस दशामें पुनः पराजयका कष्ट देखना पड़ेगा)। तुम्हारे उस भयको मैं दूर कर दूँगा
बृहदश्च उवाच