तर्कयन्ते सुरान् हन्तुं बलदर्पसमन्विता: । देवान् न गणयन्त्येते तथा दत्तवरा हि ते,“उनमें बल तो है ही, बली होनेका अभिमान भी है। वे देवताओंको मार डालनेका विचार करते हैं। देवताओंको तो वे लोग कुछ गिनते ही नहीं; क्योंकि उन्हें वैसा ही वरदान प्राप्त हो चुका है
वैशम्पायन उवाच