ब्राह्मण उवाच अहं तात सहस्रांशु: सौहृदात् त्वां निदर्शये । कुरुष्वैतद् वचो मे त्वमेतच्छेय: परं हि ते,ब्राह्मणने कहा--तात! मैं सहसारांशु सूर्य हूँ। स्नेहवश ही तुम्हें दर्शन देकर सामयिक कर्तव्य सुझा रहा हूँ। तुम मेरा कहना मान लो। इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा
ब्राह्मण उवाच