Adhyāya 290: Kuntī’s Mantra-Parīkṣā and the Appearance of Sūrya (कुन्ती–सूर्यसंवादः)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ “लोक मिलाकर कुल २९३ “लोक हैं) अपना स२ (0 अवज असल अष्टाशीरत्याधिकद्विशततमो< ध्याय: इन्द्रजित्का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा मार्कण्डेय उदाच ततः श्रुत्वा हतं संख्ये कुम्भकर्ण सहानुगम् | प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर सेवकोंसहित कुम्भकर्ण, महाधनुर्धर प्रहस्त तथा अत्यन्त तेजस्वी धूम्राक्षको संग्राममें मारा गया सुनकर रावणने अपने वीर पुत्र इन्द्रजित्से कहा--'शत्रुसूदन! तुम राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीवका वध करो इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपववके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्-युद्धाविषयक दो सी अद्वासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २८८ ॥ ८०५३ # ५० (0) चल अप एकोननवर्त्याधेकद्विशततमो< ध्याय: श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित्का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना मार्कण्डेय उवाच तावुभौ पतितौ दृष्टवा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । बबन्ध रावणिभर्भूय: शरैर्दत्तवरैस्तदा
Mārkaṇḍeya uvāca | tāv ubhau patitau dṛṣṭvā bhrātarau rāma-lakṣmaṇau | babandha rāvaṇir bhūyaḥ śaraiḥ datta-varais tadā ||
Mārkaṇḍeya said: Seeing both brothers—Rāma and Lakṣmaṇa—fallen, Rāvaṇa’s son (Indrajit) once again bound them at that time with arrows empowered by boons. The episode underscores how extraordinary power, when yoked to adharma, can temporarily overwhelm the righteous, yet does not constitute true victory.
मार्कण्डेय उवाच