जयद्रथ-निग्रहः — Jayadratha Restrained, Shamed, and Released
अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्ष॒ तव भारत । निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात् स्पृहा तव,“भारत! हमलोगोंको तो यही यज्ञ पसंद है और यही आपके लिये कल्याणकारी होगा। यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके सम्पन्न हो जाता है; अतः तुम्हारी यह यज्ञविषयक अभिलाषा भी इसीसे सफल होगी
वैशम्पायन उवाच