तस्यैव सिज्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै । द्विजश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुरुष धर्मसे ही आनन्द मानता है, धर्मका ही आश्रय लेकर जीवन- निर्वाह करता है और धर्मसे ही उपलब्ध किये हुए धनसे धनका ही मूल सींचता है, अर्थात् धर्मका पालन करता है। वह धर्ममें ही गुण देखता है
व्याध उवाच