पञ्चवर्णोत्पत्तिः — The Origin of the Five-Colored Fiery Being and Ritual-Disruptor Lineages
न केचिदीशते ब्रह्मन् स्वयंग्राह्म॒ुस्थ सत्तम । कर्मणा प्राक् कृतानां वै इह सिद्धि: प्रदृश्यते,ब्रह्म! साधुशिरोमणे! कोई अपने हाथमें आयी हुई वस्तुका भी उपयोग करनेमें समर्थ नहीं है। इस जगतमें पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके ही फलकी प्राप्ति देखी जाती है
व्याध उवाच