Dharma-vyādha’s Analysis of Moral Decline and the Mahābhūta–Guṇa Schema (धर्मव्याधोपदेशः)
तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृत: । यावज्जीवं दयावांश्व सर्वपापै: प्रमुच्यते,जो निरन्तर घरपर रहकर भी पवित्रभावसे रहता है, सदगुणोंसे विभूषित होता है और जीवनभर सब प्राणियोंपर दया रखता है, उसे मुनि ही समझना चाहिये; वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ता हो जाता है
युधिछिर उवाच