इन्द्र रवाच परीक्षार्थ मयैतत् ते वाक्यमुक्तं धनंजय । ममात्मजस्य वचन सूपपन्नमिदं तव,इन्द्र बोले--धनंजय! मैंने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये उपर्युक्त बात कही थी। तुमने जो अस्त्रविद्याके प्रति अत्यन्त उत्सुकता प्रकट की है, वह तुम्हारे जैसे मेरे पुत्रके अनुरूप ही है
अजुन उवाच