Kubera’s Arrival and the Disclosure of Agastya’s Curse
Vaiśaṃpāyana–Janamejaya Narrative
गुरूंश्न ब्राह्म॒णांश्वैव प्रणामप्रवणा: सदा | द्रोग्धव्यं न च मित्रेषु न विश्वस्तेषु करहिचित्,“गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके सम्मुख हमारा मस्तक सदा झुका रहता है। किसी भी पुरुषको कभी अपने मित्रों और विश्वासी पुरुषोंके साथ द्रोह नहीं करना चाहिये
वैशम्पायन उवाच