Gaṅgā-Tīrtha Darśana and the Prelude to the Yavakrīta–Indra Exemplum (लोमश-युधिष्ठिर संवादः)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३१ श्लोक हैं) #ड.7 ऋण (_) हि ० चतुस्त्रिंशर्दाधिकशततमो< ध्याय: बन्दी और अष्टावक्रका शानच्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समड़्ामें स्सनानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना सअद्टावक्र उवाच अत्रोग्रसेन समितेषु राजन् समागतेष्वप्रतिमेषु राजसु । नावैमि बर्न्दिं वरमत्र वादिनां महाजले हंसमिवाददामि,अष्टावक्र बोले--भयंकर सेनाओंसे युक्त महाराज जनक! इस सभामें सब ओरसे अप्रतिम प्रभावशाली राजा आकर एकत्र हुए हैं; परंतु मैं इन सबके बीचमें वादियोंमें प्रधान बन्दीको नहीं पहचान पाता हूँ। यदि पहचान लूँ तो अगाध जलमें हंसकी भाँति उन्हें अवश्य पकड़ लूँगा
aṣṭāvakra uvāca |
atrograsena samiteṣu rājan samāgateṣv apratimeṣu rājasu |
nāvemi bandiṃ varam atra vādinaṃ mahājale haṃsam ivādadāmi ||
Aṣṭāvakra said: “O King, here—amid these assembled formidable armies—when peerless kings have gathered together, I cannot yet make out Bandi, the foremost of debaters. But if I do recognize him, I shall seize him, as a swan takes its prey in the vast waters.”
सअद्टावक्र उवाच