इति तीर्थानुसरतरं राक्षसी काचिदब्रवीत् । एकरात्रशयी गेहे महोलूखलमेखला,विशाल ओखलियोंकी मेखला (करधनी) धारण करनेवाली किसी राक्षसीने किसी तीर्थयात्रीके घरमें एक रात रहकर उससे इस प्रकार कहा था-- इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे चतुश्नत्वारिंशो5ध्याय:
कर्ण उवाच