यत् त्वं प्रेरयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया । शक्यं बहुविधैर्यज्ञिर्यट्टं सूत यजस्व तै:,सूत! तुम जो बहुत धन देनेकी यहाँ घोषणा कर रहे हो, निश्चय ही उसके द्वारा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कर सकते हो; अतः तुम उन धन-वैभवोंद्वारा यज्ञोंका ही अनुष्ठान करो
शल्य उवाच