कृच्छेषु या धारयतामात्मानं व्यसनेषु च । गति: शोकाग्निदग्धानां तां गतिं व्रज पुत्रक,“बेटा! जो लोग भारी-से-भारी कठिनाइयोंमें और संकटोंमें पड़नेपर तथा शोकाग्निसे दग्ध होनेपर भी धैर्य धारण करके अपने-आपको स्थिर रखते हैं, उन्हें मिलनेवाली गतिको तुम भी प्राप्त करो
संजय उवाच