तुभ्यं तुभ्यमिति प्रादान्निष्कान् निष्कान् सहस्रश: । ततः पुनः समाश्चास्य निष्कानेव प्रयच्छति,“तुम्हारे लिये, तुम्हारे लिये” कहकर वे हजारों निष्क दान किया करते थे। इतनेपर भी जो ब्राह्मण पाये बिना रह जाते, उन्हें पुनः आश्वासन देकर वे बहुत-से निष्क ही देते थे
नारद उवाच