Droṇa-parva Adhyāya 58: Yudhiṣṭhira’s dawn rites, royal gifts, and the reception of Kṛṣṇa
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयो- पाख्यानविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५७ ॥ ऑपन-साज बक। अऑि-छऋाय अष्टपञज्चाशत्तमो< ध्याय: राजा शिबिके यज्ञ और दानकी महत्ता नारद उवाच शिबिमौशीनरं चापि मृतं सृज्जय शुश्रुम । य इमां पृथिवीं सर्वा चर्मवत् पर्यवेष्टयत्,नारदजी कहते हैं--सूंजय! जिन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीको चमड़ेकी भाँति लपेट लिया था, (सर्वथा अपने अधीन कर लिया था) वे उशीनरपुत्र राजा शिबि भी मरे थे, यह हमने सुना है इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक जद्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५८ ॥ भनीप्स््ज्ल्िसज (9) नीला एकोनषशष्टितमो< ध्याय: भगवान् श्रीरामका चरित्र नारद उवाच रामं दाशरथिं चैव मृतं सृज्जय शुश्रुम । यं प्रजा अन्वमोदन्त पिता पुत्रानिवौरसान्
nārada uvāca | śibim auśīnaraṃ cāpi mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | ya imāṃ pṛthivīṃ sarvāṃ carmavat paryaveṣṭayat |
Narada said: “O Sṛñjaya, we have heard that even Śibi, the son of Uśīnara, has died—he who once ‘wrapped up’ this entire earth like a hide, bringing it wholly under his sway. The point is clear: even the most powerful and world-subduing kings are not exempt from mortality.”
नारद उवाच