तस्य रोषान्महाराज खेभ्योडग्निरुदतिष्ठत । तेन सर्वा दिशो व्याप्ता: सान्तर्देशा दिधक्षता,महाराज! उस समय क्रोधवश ब्रह्माजीके श्रवण-नेत्र आदि इन्द्रियोंसे अग्नि प्रकट हो गयी। वह अग्नि इस जगत्को दग्ध करनेकी इच्छासे सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओं (कोणों)-में फैल गयी
नारद उवाच