सैन्धवविक्रमवर्णनम् / Description of Jayadratha’s Martial Display
एवमुक्तस्तु शर्वेण सिन्धुराजो जयद्रथ: । उवाच प्रणतो रुद्रं प्राजजलिरनियतात्मवान्,अभ्यद्रवन् परीप्सन्तो व्यूढानीका: प्रहारिण: । संजयने कहा--राजन! युधिष्ठिर, भीमसेन, शिखण्डी, सात्यकि, नकुल-सहदेव, धष्टद्युम्न, विराट, द्रपद, केकय-राजकुमार, रोषमें भरा हुआ धृष्टकेतु तथा मत्स्यदेशीय योद्धा --ये सब-के-सब युद्धस्थलमें आगे बढ़े। अभिमन्युके ताऊ, चाचा तथा मामागण अपनी सेनाको व्यूहद्वारा संगठित करके प्रहार करनेके लिये उद्यत हो अभिमन्युकी रक्षाके लिये उसीके बनाये हुए मार्गसे व्यूहमें जानेके उद्देश्यसे एक साथ दौड़ पड़े भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सिंधुराज जयद्रथने अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर उन रुद्रदेवको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा--
evam uktas tu śarveṇa sindhurājo jayadrathaḥ | uvāca praṇato rudraṁ prāñjalir aniyātātmavān ||
Sañjaya said: Thus addressed by Śarva (Rudra), Jayadratha, the king of Sindhu, bowed down to Rudra. With palms joined in reverence, having brought his mind under restraint, he spoke—signaling a moment where martial intent is framed by devotion and the seeking of divine sanction amid the pressures of war.
संजय उवाच