नामर्ष तत्र कुर्वन्ति धिक क्षात्रं धिगमर्षिताम् । धृतराष्ट्र बोले--संजय! जिन महात्माने विधिपूर्वक अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था, जिन लज्जाशील सत्पुरुषमें साक्षात् धथनुर्वेद प्रतिष्ठित था, जिनके कृपाप्रसादसे कितने ही पुरुषरत्न योद्धा संग्रामभूमिमें ऐसे-ऐसे अलौकिक पराक्रम कर दिखाते थे, जो देवताओं के लिये भी दुष्कर थे; उन्हीं द्रोणाचार्यकी वह पापी, नीच, नृशंस, क्षुद्र और गुरुधाती धृष्टद्युम्मन सबके सामने निन््दा कर रहा था और लोग क्रोध नहीं प्रकट करते थे। धिक्कार है ऐसे क्षत्रियोंको! और धिक्कार है उनके अमर्षशील स्वभावको!! ।। १ -+3३३ || पार्था: सर्वे च राजान: पृथिव्यां ये धनुर्धरा:
nāmarṣaṃ tatra kurvanti dhik kṣātraṃ dhig amarṣitām |
Dhṛtarāṣṭra said: “They show no righteous indignation there. Shame on such kṣatriyahood, and shame on the temper of those who cannot be stirred to anger when honor and duty are violated.”
धृतराष्ट उवाच