पितेव नित्यं सौहार्दात् पितेव हि च धर्मत: । सो5ल््पकालस्य राज्यस्य कारणादू घातितो गुरु:,जो सदा पिताकी भाँति हमलोगोंपर स्नेह रखते और हमारा हित चाहते थे, धर्मदृष्टिसे भी जो हमारे पिताके ही तुल्य थे, उन्हीं गुरुदेवको हमने इस क्षणभंगुर राज्यके लिये मरवा दिया
अजुन उवाच