तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखै: । मर्माण्यभ्यहनद् भूय: स व्यथां परमामगात्,तदनन्तर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्मनका धनुष काटकर उन्हें बाणोंद्वारा घायल कर दिया और पुनः उनके मर्मस्थानोंको गहरी चोट पहुँचायी; इससे उन्हें बड़ी व्यथा हुई
संजय उवाच