वे जूएके मध्यभागमें और द्रोणाचार्यके लाल घोड़ोंकी पीठपर पैर रखकर खड़े थे। उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको उनके ऊपर प्रहार करनेका कोई अवसर ही नहीं दिखायी देता था, यह एक अदभुत-सी बात हुई ।। क्षिप्रं श्येनस्थ चरतो यथैवामिषगृद्धिन: । तद्धदासीदभीसारो द्रोणपार्षतयो रणे
संजय उवाच