स्पर्थिनश्व महेष्वासा: कृतयत्ना धनुर्धरा: । अभ्यगच्छंस्तथान्योन्यं मत्ता गजवृषा इव,महाराज! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए वे परस्पर स्पर्धा रखनेवाले, विजयके लिये प्रयत्मशील और विशाल धनुष धारण करनेवाले धनुर्थर योद्धा मतवाले गजराजोंके समान एक-दूसरेसे जूझ रहे थे
संजय उवाच