Shloka 46

हतशिष्टा: सरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिका: । (विभिन्नशिरसो राजन दन्तैश्छिन्नेश्व॒ दन्तिन: । निर्धूतैश्व॒ करैनागा व्यड्राश्न शतश: कृता: ।। हत्वा पञ्चशतान्‌ योधांस्तत्क्षणेनैव मारिष । व्यचरत्‌ पृतनामध्ये शैनेय: कृतहस्तवत्‌ ।।) कुण्जरा वर्जयामासुर्युयुधानरथं तदा,जो मरनेसे बचे थे, वे हाथी भी खूनसे लथपथ हो रहे थे। उनके कुम्भस्थल विदीर्ण हो गये थे। राजन! बहुत-से हाथियोंके सिर क्षत-विक्षत हो गये थे। उनके दाँत टूट गये थे, शुण्डदण्ड खण्डित हो गये थे तथा सैकड़ों गजराजोंके सात्यकिने अंग-भंग कर दिये थे। माननीय नरेश! सात्यकि सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति क्षणभरमें पाँच सौ योद्धाओंका संहार करके सेनाके मध्यभागमें विचरने लगे। उस समय घायल हुए हाथी युयुधानके रथको छोड़कर भाग गये

कुञ्जराःelephants
कुञ्जराः:
Karta
TypeNoun
Rootकुञ्जर
FormMasculine, Nominative, Plural
वर्जयामासुःavoided / left aside
वर्जयामासुः:
TypeVerb
Rootवर्जय् (वृज्/वर्ज् caus.)
FormPerfect (Liṭ), 3rd, Plural, Parasmaipada
युयुधानYuyudhāna (Sātyaki)
युयुधान:
TypeNoun
Rootयुयुधान (सात्यकि)
FormMasculine, Accusative, Singular
रथम्chariot
रथम्:
Karma
TypeNoun
Rootरथ
FormMasculine, Accusative, Singular
तदाthen
तदा:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootतदा

संजय उवाच