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Shloka 1

Abhimanyu’s Assault on Bhīṣma’s Screen; Banner-Felling and Reinforcements (सौभद्र-भीष्म-समरः)

भीष्मपर्वमें चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ४० ॥। ऑपन--माजल बछ। अकाल २. अपने धर्मका पालन करनेके लिये कष्ट सहन करके जो अन्त:ः:करण और इन्द्रियोंको तपाना है, उसीका नाम यहाँ “तप: पद है। गीताके सतरहवें अध्यायमें जिस शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका निरूपण है--यहाँ “तपः:” पदसे उसका निर्देश नहीं है; क्योंकि उसमें अहिंसा, सत्य, शौच, स्वाध्याय और आर्जव आदि जिन लक्षणोंका तपके अंगरूपमें निरूपण हुआ है, यहाँ उनका अलग वर्णन किया गया है। ३. किसी भी प्राणीको कभी कहीं भी लोभ, मोह या क्रोधपूर्वक अधिक मात्रामें, मध्य मात्रामें या थोड़ा-सा भी किसी प्रकारका कष्ट स्वयं देना, दूसरेसे दिलवाना या कोई किसीको कष्ट देता हो तो उसका अनुमोदन करना--हर हालतमें हिंसा है। इस प्रकारकी हिंसाका किसी भी निमित्तसे मन, वाणी, शरीरद्वारा न करना--अर्थात्‌ मनसे किसीका बुरा न चाहना, वाणीसे किसीको न तो गाली देना, न कठोर वचन कहना और न किसी प्रकारके हानिकारक वचन ही कहना तथा शरीरसे न किसीको मारना, न कष्ट पहुँचाना और न किसी प्रकारकी हानि ही पहुँचाना आदि--ये सभी अहिंसाके भेद हैं। २. केवल गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, मेरा इन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है--ऐसा मानकर अथवा मैं तो भगवान्‌के हाथकी कठपुतलीमात्र हूँ, भगवान्‌ ही अपने इच्छानुसार मेरे मन, वाणी और शरीरसे सब कर्म करवा रहे हैं, मुझमें न तो अपने-आप कुछ करनेकी शक्ति है और न मैं कुछ करता ही हूँ--ऐसा मानकर कर्तृत्व-अभिमानका त्याग करना ही त्याग है या कर्तव्यकर्म करते हुए उनमें ममता, आसक्ति, फल और स्वार्थका सर्वथा त्याग करना भी त्याग है एवं आत्मोजन्नतिमें विरोधी वस्तु, भाव और क्रियामात्रके त्यागका नाम भी “त्याग” कहा जा सकता है। 3. दूसरेके दोष देखना या उन्हें लोगोंमें प्रकट करना अथवा किसीकी निनन्‍्दा या चुगली करना पिशुनता है; इसके सर्वथा अभावका नाम “अपैशुन' है। ४. किसी भी प्राणीको दुःखी देखकर उसके दुःखको जिस किसी प्रकारसे किसी भी स्वार्थकी कल्पना किये बिना ही निवारण करनेका और सब प्रकारसे उसे सुखी बनानेका जो भाव है, उसे “दया” कहते हैं। दूसरोंको कष्ट नहीं पहुँचाना “अहिंसा' है और उनको सुख पहुँचानेका भाव “दया” है। यही अहिंसा और दयाका भेद है। ५. अन्त:करण, वाणी और व्यवहारमें जो कठोरताका सर्वथा अभाव होकर उनका अतिशय कोमल हो जाना है, उसीको '"मार्दव” कहते हैं। ६. हाथ-पैर आदिको हिलाना, तिनके तोड़ना, जमीन कुरेदना, बेमतलब बकते रहना, बेसिर-पैरकी बातें सोचना आदि हाथ-पैर, वाणी और मनकी व्यर्थ चेष्टाओंका नाम चपलता है। इसीको प्रमाद भी कहते हैं। इसके सर्वधा अभावको “अचापल' कहते हैं। ७. श्रेष्ठ पुरुषोंकी उस शक्तिविशेषका नाम तेज है, जिसके कारण उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृतिवाले मनुष्य भी प्राय: अन्यायाचरणसे रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कमोमें प्रवृत्त हो जाते हैं। ८. भारी-से-भारी आपत्ति, भय या दु:ख उपस्थित होनेपर भी विचलित न होना; काम, क्रोध, भय या लोभसे किसी प्रकार भी अपने धर्म और कर्तव्यसे विमुख न होना “बैर्य' है। ९. इस अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर इस श्लोकके पूर्वार्द्धतक ढाई श्लोकोंमें छब्बीस लक्षणोंके रूपमें उस दैवीसम्पदरूप सदगुण और सदाचारका ही वर्णन किया गया है। अत: ये सब लक्षण जिसमें स्वभावसे विद्यमान हों अथवा जिसने साधनद्वारा प्राप्त कर लिये हों, वही पुरुष दैवीसम्पदसे युक्त है। ३०. मान, बड़ाई, पूजा और प्रतिष्ठाके लिये, धनादिके लोभसे या किसीको ठगनेके अभिप्रायसे अपनेको धर्मात्मा, भगवद्धक्त, ज्ञानी या महात्मा प्रसिद्ध करना अथवा दिखाऊ धर्मपालनका, दानीपनका, भक्तिका, व्रत-उपवासादिका, योग-साधनका और जिस किसी भी रूपमें रहनेसे अपना काम सधता हो, उसीका ढोंग रचना “दम्भ' है। $. विद्या, धन, कुटुम्ब, जाति, अवस्था, बल और ऐश्वर्य आदिके सम्बन्धसे जो मनमें गर्व होता है--जिसके कारण मनुष्य दूसरोंको तुच्छ समझकर उनकी अवहेलना करता है, उसका नाम “घमण्ड' है। २. अपनेको श्रेष्ठ, बड़ा या पूज्य समझना, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और पूजा आदिकी इच्छा रखना एवं इन सबके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना 'अभिमान' है। ३. बुरी आदतके अथवा क्रोधी मनुष्योंके संगके कारण या किसीके द्वारा अपना तिरस्कार, अपकार या निन्दा किये जानेपर, मनके विरुद्ध कार्य होनेपर, किसीके द्वारा दुर्ववचन सुनकर या किसीका अन्याय देखकर--इत्यादि किसी भी कारणसे अन्तःकरणमें जो द्वेषयुक्त उत्तेजना हो जाती है--जिसके कारण मनुष्यके मनमें प्रतिहिंसाके भाव जाग्रत्‌ हो उठते हैं, नेत्रोंमे लाली आ जाती है, होठ फड़कने लगते हैं, मुखकी आकृति भयानक हो जाती है, बुद्धि मारी जाती है और कर्तव्यका विवेक नहीं रह जाता--इत्यादि किसी प्रकारकी भी “उत्तेजित वृत्ति” का नाम “क्रोध” है। ४. कोमलताके अत्यन्त अभावका नाम कठोरता है। किसीको गाली देना, कटुवचन कहना, ताने मारना आदि वाणीकी कठोरता है, विनयका अभाव शरीरकी कठोरता है तथा क्षमा और दयाके विरुद्ध प्रतिहिंसा और क्रूरताके भावको मनकी कठोरता कहते हैं। ५. सत्य-असत्य और धर्म-अधर्म आदिको यथार्थ न समझना या उनके सम्बन्धमें विपरीत निश्चय कर लेना ही यहाँ 'अज्ञान' है। ६. इस श्लोकमें दुर्गुण और दुराचारोंके समुदायरूप आसुरीसम्पद्‌ संक्षेपमें बतलायी गयी है। अत: ये सब या इनमेंसे कोई भी लक्षण जिसमें विद्यमान हो, उसे आसुरीसम्पदासे युक्त समझना चाहिये। ७. इसी अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर तीसरे श्लोकतक सात्त्विक गुण और आचरणोंके समुदायरूप जिस दैवी- सम्पदाका वर्णन किया गया है, वह मनुष्यको संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त करके सच्चिदानन्दघन परमेश्वरसे मिला देनेवाली है--ऐसा वेद, शास्त्र और महात्मा सभी मानते हैं। ८. 'सर्ग” सृष्टिको कहते हैं, भूतोंकी सृष्टिको भूतसर्ग कहते हैं। यहाँ “अस्मिन्‌ लोके” से मनुष्यलोकका संकेत किया गया है तथा इस अध्यायमें मनुष्योंके लक्षण बतलाये गये हैं, इसी कारण यहाँ 'भूतसर्गा" पदका अर्थ “मनुष्यसमुदाय' किया गया है। ९. मनुष्योंके दो समुदायोंमेंसे जो सात्तविक है, वह तो दैवी प्रकृतिवाला है और जो रजोमिश्रित तमः:प्रधान है, वह आसुरी प्रकृतिवाला है। 'राक्षसी” और “मोहिनी' प्रकृतिवाले मनुष्योंको यहाँ आसुरी प्रकृतिवाले समुदायके अन्तर्गत ही समझना चाहिये। १०. जिस कर्मके आचरणसे इस लोक और परलोकमें मनुष्यका यथार्थ कल्याण होता है, वही कर्तव्य है। मनुष्यको उसीमें प्रवृत्त होना चाहिये और जिस कर्मके आचरणसे अकल्याण होता है, वह अकर्तव्य है, उससे निवृत्त होना चाहिये। भगवानने यहाँ यह भाव दिखलाया है कि आसुरस्वभाववाले मनुष्य इस कर्तव्य-अकर्तव्य-सम्बन्धी प्रवृत्ति और निवृत्तिको बिलकुल नहीं समझते; इसलिये जो कुछ उनके मनमें आता है, वही करने लगते हैं। ३. यहाँ आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंकी मनगढ़ंत कल्पनाका वर्णन किया गया है। वे लोग ऐसा मानते हैं कि न तो इस चराचर जगत्‌का भगवान्‌ या कोई धर्माधर्म ही आधार है तथा न इस जगत्‌की कोई नित्य सत्ता है अर्थात्‌ न तो जन्मसे पहले या मरनेके बाद किसी भी जीवका अस्तित्व है एवं न कोई इसका रचयिता, नियामक और शासक ईश्वर ही है। २. नास्तिक सिद्धान्तवाले मनुष्य आत्माकी सत्ता नहीं मानते, वे केवल देहवादी या भौतिकवादी ही होते हैं; इससे उनका स्वभाव भ्रष्ट हो जाता है, उनकी किसी भी सत्कार्यके करनेमें प्रवृत्ति नहीं होती। उनकी बुद्धि भी अत्यन्त मन्द होती है; वे जो कुछ निश्चय करते हैं, सब केवल भोग-सुखकी दृष्टिसे ही करते हैं। उनका मन निरन्तर सबका अहित करनेकी बात ही सोचा करता है, इससे वे अपना भी अहित ही करते हैं तथा मन, वाणी, शरीरसे चराचर जीवोंको डराने, दु:ख देने और उनका नाश करनेवाले बड़े-बड़े भयानक कर्म ही करते रहते हैं। 3. जिनके खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल, व्यवसाय-वाणिज्य, देन-लेन और बर्ताव-व्यवहार आदि शास्त्रविरुद्ध और भ्रष्ट होते हैं, वे भ्रष्ट आचरणोंवाले कहे जाते हैं। ४. आसुरस्वभाववाले मनुष्य मनमें उठनेवाली कल्पनाओंकी पूर्तिके लिये भाँति-भाँतिकी सैकड़ों आशाएँ लगाये रहते हैं। उनका मन कभी किसी विषयकी आशामें लटकता है, कभी किसीमें खिंचता है और कभी किसीमें अटकता है; इस प्रकार आशाओंके बन्धनसे वे कभी छूटते ही नहीं। इसीसे उनको सैकड़ों आशाओंकी फॉँसियोंसे बँधे हुए कहा गया है। ५. विषय-भोगोंके उद्देश्यसे जो काम-क्रोधका अवलम्बन करके अन्यायपूर्वक अर्थात्‌ चोरी, ठगी, डाका, झूठ, कपट, छल, दम्भ, मार-पीट, कूटनीति, जूआ, धोखेबाजी, विष-प्रयोग, झूठे मुकद्दमे और भय-प्रदान आदि शास्त्रविरुद्ध उपायोंके द्वारा दूसरोंक धनादिको हरण करनेकी चेष्टा करना है--यही विषय-भोगोंके लिये अन्यायसे अर्थसंचय करनेका प्रयत्न करना है। ३. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि अहंकारके साथ ही वे मानमें भी चूर रहते हैं, इससे ऐसा समझते हैं कि 'संसारमें हमसे बड़ा और है ही कौन; हम जिसे चाहें; मार दें, बचा दें, जिसकी चाहें जड़ उखाड़ दें या रोप दें।” अतः बड़े गर्वके साथ कहते हैं--“अरे! हम सर्वथा स्वतन्त्र हैं, सब कुछ हमारे ही हाथोंमें तो है; हमारे सिवा दूसरा कौन एऐश्वर्यवान्‌ है, सारे ऐश्वर्योंके स्वामी हमीं तो हैं। सारे ईश्वरोंके ईश्वर परम पुरुष भी तो हमीं हैं। सबको हमारी ही पूजा करनी चाहिये। हम केवल एऐश्वर्यके स्वामी ही नहीं, समस्त ऐश्वर्यका भोग भी करते हैं। हमने अपने जीवनमें कभी विफलताका अनुभव किया ही नहीं; हमने जहाँ हाथ डाला, वहीं सफलताने हमारा अनुगमन किया। हम सदा सफलजीवन हैं, परम सिद्ध हैं, भविष्यमें होनेवाली घटना हमें पहलेसे ही मालूम हो जाती है। हम सब कुछ जानते हैं, कोई बात हमसे छिपी नहीं है। इतना ही नहीं, हम बड़े बलवान हैं; हमारे मनोबल या शारीरिक बलका इतना प्रभाव है कि जो कोई उसका सहारा लेगा, वही उस बलसे जगत्‌पर विजय पा लेगा। इन्हीं सब कारणोंसे हम परम सुखी हैं; संसारके सारे सुख सदा हमारी सेवा करते हैं और करते रहेंगे।” २. अभिप्राय यह है कि ऐसे मनुष्य कामोपभोगके लिये भाँति-भाँतिके पाप करते हैं और उनका फल भोगनेके लिये उन्हें विष्ठा, मूत्र, रुधिर, पीब आदि गंदी वस्तुओंसे भरे दुःखदायक कुम्भीपाक, रौरवादि घोर नरकोंमें गिरना पड़ता है। 3. जो अपने ही मनसे अपने-आपको सब बातोंमें सर्वश्रेष्ठ, सम्मान्य, उच्च और पूज्य मानते हैं, वे “आत्मसम्भावित' हैं। ४. जो घमण्डके कारण किसीके साथ--यहाँतक कि पूजनीयोंके प्रति भी विनयका व्यवहार नहीं करते, वे 'स्तब्ध' हैं। ५. दूसरोंके दोष देखना, देखकर उनकी निन्दा करना, उनके गुणोंका खण्डन करना और गुणोंमें दोषारोपण करना एवं भगवान्‌ और संत पुरुषोंमें भी दोष देखते रहना--इन सब दोषोंसे युक्त मनुष्यको “अभ्यसूयक' कहते हैं। ६. सभीके अंदर अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वर स्थित हैं। अत: किसीसे विरोध या द्वेष करना, किसीका अहित करना और किसीको दु:ख पहुँचाना अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित परमेश्वरसे ही द्वेष करना है। ७. सिंह, बाघ, सर्प, बिच्छू, सूअर, कुत्ते और कौए आदि जितने भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग हैं--ये सभी आसुरी योनियाँ हैं। $. मनुष्ययोनिमें जीवको भगवत्प्राप्तिका अधिकार है। इस अधिकारको प्राप्त होकर भी जो मनुष्य इस बातको भूलकर, दैव-स्वभावरूप भगवत्प्राप्तिके मार्कको छोड़कर आसुरस्वभावका अवलम्बन करते हैं, वे मनुष्य-शरीरका सुअवसर पाकर भी भगवानको नहीं पा सकते--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको न पानेकी बात कही है। २. स्त्री, पुत्र आदि समस्त भोगोंकी कामनाका नाम 'काम' है; इस कामनाके वशीभूत होकर ही मनुष्य चोरी, व्यभिचार और अभक्ष्य-भोजनादि नाना प्रकारके पाप करते हैं। मनके विपरीत होनेपर जो उत्तेजनामय वृत्ति उत्पन्न होती है, उसका नाम “क्रोध” है; क्रोधके आवेशमें मनुष्य हिंसा-प्रतिहिंसा आदि भाँति-भाँतिके पाप करते हैं। धनादि विषयोंकी अत्यन्त बढ़ी हुई लालसाको “लोभ” कहते हैं। लोभी मनुष्य उचित अवसरपर धनका त्याग नहीं करते एवं अनुचितरूपसे भी उपार्जन और संग्रह करनेमें लगे रहते हैं; इसके कारण उनके द्वारा झूठ, कपट, चोरी और विश्वासघात आदि बड़े-बड़े पाप बन जाते हैं। मनुष्य जबसे काम, क्रोध, लोभके वशमें होते हैं, तभीसे वे अपने विचार, आचरण और भावोंमें गिरने लगते हैं। काम, क्रोध और लोभके कारण उनसे ऐसे कर्म होते हैं, जिनसे उनका शारीरिक पतन हो जाता है, मन बुरे विचारोंसे भर जाता है, बुद्धि बिगड़ जाती है, क्रियाएँ सब दूषित हो जाती हैं और इसके फलस्वरूप उनका वर्तमान जीवन सुख, शान्ति और पवित्रतासे रहित होकर दुःखमय बन जाता है तथा मरनेके बाद उनको आसुरी योनियोंकी और नरकोंकी प्राप्ति होती है। इसीलिये इन त्रिविध दोषोंको “नरकके द्वार और आत्माका नाश करनेवाले” बतलाया गया है। ३. काम, क्रोध और लोभ आदि आसुरीसम्पदाका त्याग करके शास्त्रप्रतिपदित सदगुण और सदाचाररूप दैवीसम्पदाका निष्कामभावसे सेवन करना ही कल्याणके लिये आचरण करना है। ४. वेद और वेदोंके आधारपर रचित स्मृति, पुराण, इतिहासादि सभीका नाम शास्त्र है। आसुरीसम्पदाके आचार- व्यवहार आदिके त्यागका और दैवीसम्पदारूप कल्याणकारी गुण-आचरणोंके सेवनका ज्ञान शास्त्रोंसे ही होता है। कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान करानेवाले शास्त्रोंके विधानकी अवहेलना करके अपनी बुद्धिसे अच्छा समझकर जो मनमाने तौरपर मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा आदि किसीकी भी इच्छाविशेषको लेकर आचरण करना है, यही शास्त्रविधिको त्यागकर मनमाना आचरण करना है। ऐसे कर्म करनेवाले कर्ताको कोई भी फल नहीं मिलता अर्थात्‌ परमगति नहीं मिलती--इसमें तो कहना ही क्‍या है, लौकिक अणिमादि सिद्धि और स्वर्गप्राप्तिरूप सिद्धि भी नहीं मिलती एवं संसारमें सात््विक सुख भी नहीं मिलता। ३१. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि क्‍या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये--इसकी व्यवस्था श्रुति, वेदमूलक स्मृति और पुराण-इतिहासादि शास्त्रोंसे प्राप्त होती है। अतएव इस विषयमें मनुष्यकों मममाना आचरण न करके शास्त्रोंको ही प्रमाण मानना चाहिये अर्थात्‌ इन शास्त्रोंमें जिन कर्मोंके करनेका विधान है, उनको करना चाहिये और जिनका निषेध है, उन्हें नहीं करना चाहिये। तथा उन शास्त्रविहित शुभ कर्मोका आचरण भी निष्कामभावसे ही करना चाहिये, क्योंकि शास्त्रोंमें निष्ठामभावसे किये हुए शुभ कर्मोंको ही भगवत्प्राप्तिमें हेतु बतलाया है। एकचत्वारिशो< ध्याय: (श्रीमद्धगवद्‌्गीतायां सप्तदशो<्ध्याय:) श्रद्धाका और शास्त्रविपरीत घोर तप करनेवालोंका वर्णन, आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्‌-पृथक्‌ भेद तथा ३०, तत्‌, सतके प्रयोगकी व्याख्या सम्बन्ध-गीताके सोलहवें जध्यायके आरम्भमें श्रीभगवानने निष्कामभावसे सेवन किये जानेवाले शासत्रविहित गुण और आचरणोंका दैवीसम्पदाके नागमसे वर्णन करके फिर शासत्रविपरीत आयुरी सम्पत्तिका कथन किया। साथ ही आयुरस्वभाववाले पुरुषोंको नरकोंमें गिरानेकी बात कही और यह बतलाया कि काम, क्रोध, लोभ ही आयुरीसम्पदाके प्रधान अवगुण हैं और ये तीनों ही नरकोंके द्वार हैं. इनका त्याग करके जो आत्मकल्याणके लिये साधन करता है, वह परम यतिको प्राप्त होता है। इसके अनन्तर यह कहा कि जो शासत्रविधिका त्याग करके मनगाने ढंगसे अपनी समझसे जिसको अच्छा कर्म समझता है, वही करता है; उसे अपने उन कर्मोका फल नहीं मिलता; यह तो ठीक ही है; परंतु ऐसे लोग भी तो हो सकते हैं. जो शासत्रविधिका तो न जाननेके कारण अथवा अन्य किसी कारणसे त्याग कर बैठते हैं तथा यज्ञ- पूजादि शुभ कर्म श्रद्धापूर्वक करते हैं; उनकी क्या स्थिति होती है? इस जिज्ञासाको व्यक्त करते हुए अर्जुन भगवानूसे पूछते हैं-- अजुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृूज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता: । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तम:,अर्जुन बोले--हे कृष्ण! जो श्रद्धासे युक्त मनुष्य शास्त्रविधिको त्यागकर देवादिका पूजन करते हैं,* उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी5

arjuna uvāca | ye śāstravidhim utsṛjya yajante śraddhayānvitāḥ | teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvam āho rajas tamaḥ ||

Arjuna said: O Krishna, those people who, endowed with faith, worship (perform rites of devotion and sacrifice) while setting aside the injunctions of scripture—what is their standing? Is it grounded in clarity and goodness (sattva), or in passion (rajas), or in darkness and delusion (tamas)?

अर्जुनःArjuna
अर्जुनः:
Karta
TypeNoun
Rootअर्जुन
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect (Paroksha-bhuta), Third, Singular, Parasmaipada
येthose who
ये:
Karta
TypePronoun
Rootयद्
FormMasculine, Nominative, Plural
शास्त्र-विधिम्scriptural injunction
शास्त्र-विधिम्:
Karma
TypeNoun
Rootशास्त्र-विधि
FormMasculine, Accusative, Singular
उत्सृज्यhaving abandoned
उत्सृज्य:
TypeIndeclinable
Rootउत्-√सृज्
FormLyap (absolutive/gerund)
यजन्तेworship/sacrifice
यजन्ते:
TypeVerb
Rootयज्
FormPresent, Third, Plural, Atmanepada
श्रद्धयाwith faith
श्रद्धया:
Karana
TypeNoun
Rootश्रद्धा
FormFeminine, Instrumental, Singular
अन्विताःendowed (with)
अन्विताः:
TypeAdjective
Rootअन्वित
FormMasculine, Nominative, Plural
तेषाम्of them
तेषाम्:
TypePronoun
Rootतद्
FormMasculine, Genitive, Plural
निष्ठाsteadfastness/state
निष्ठा:
Karta
TypeNoun
Rootनिष्ठा
FormFeminine, Nominative, Singular
तुbut/indeed
तु:
TypeIndeclinable
Rootतु
काwhat (which?)
का:
TypePronoun
Rootकिम्
FormFeminine, Nominative, Singular
कृष्णO Krishna
कृष्ण:
TypeNoun
Rootकृष्ण
FormMasculine, Vocative, Singular
सत्त्वम्sattva (purity)
सत्त्वम्:
TypeNoun
Rootसत्त्व
FormNeuter, Nominative, Singular
आहोor else / or
आहो:
TypeIndeclinable
Rootआहो
रजःrajas (passion)
रजः:
TypeNoun
Rootरजस्
FormNeuter, Nominative, Singular
तमःtamas (darkness)
तमः:
TypeNoun
Rootतमस्
FormNeuter, Nominative, Singular

अजुन उवाच

A
Arjuna
K
Krishna
Ś
śāstra (scripture)

Educational Q&A

The verse frames a moral and psychological inquiry: faith alone is not a sufficient measure of spiritual quality; Arjuna asks how to evaluate non-scriptural religious practice by the three guṇas—whether it tends toward clarity (sattva), passion-driven desire (rajas), or delusion and harmful error (tamas).

After hearing that ignoring śāstra leads to no true spiritual fruit, Arjuna raises a practical doubt: many people worship sincerely yet do not follow scriptural injunctions. He asks Krishna to classify their ‘standing’ (niṣṭhā) in terms of sattva, rajas, and tamas, setting up the teaching of the seventeenth chapter on faith and its types.