Nirmaryāda-saṃgrāma-varṇana — The Unbounded Clash and Bhīṣma’s Rallying Presence
४) अर्थात् “मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे युक्त आत्माको ही ज्ञानीजन भोक्ता--ऐसा कहते हैं।' ८. ज्ञानीजन शरीर छोड़कर जाते समय, शरीरमें रहते समय और विषयोंका उपभोग करते समय हरेक अवस्थामें ही वह आत्मा वास्तवमें प्रकृतिसे सर्वधा अतीत, शुद्ध, बोधस्वरूप और असंग ही है--ऐसा समझते हैं। १. जिनका अन्तःकरण शुद्ध है और अपने वशमें है तथा जो आत्मस्वरूपको जाननेके लिये निरन्तर श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि प्रयत्न करते रहते हैं, ऐसे उच्चकोटिके साधक ही “यत्न करनेवाले योगीजन' हैं तथा जिस जीवात्माका प्रकरण चल रहा है और जो शरीरके सम्बन्धसे हृदयमें स्थित कहा जाता है, उसके नित्य-शुद्ध-विज्ञानानन्दमय वास्तविक स्वरूपको यथार्थ जान लेना ही उनका “इस आत्माको तत्त्वसे जानना है। २. जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है अर्थात् न तो निष्काम कर्म आदिके द्वारा जिनके अन्तःकरणका मल सर्वथा धुल गया है एवं न जिन्होंने भक्ति आदिके द्वारा चित्तको स्थिर करनेका ही कभी समुचित अभ्यास किया है, ऐसे मलिन और विक्षिप्त अन्तःकरणवाले पुरुषोंको “अकृतात्मा” कहते हैं। ऐसे मनुष्य अपने अन्तःकरणको शुद्ध बनानेकी चेष्टा न करके यदि केवल उस आत्माको जाननेके लिये शास्त्रालोचनरूप प्रयत्न करते रहें तो भी उसके तत्त्वको नहीं समझ सकते। 3. सूर्य, चन्द्रमा और अग्निमें स्थित समस्त तेजको अपना तेज बतलाकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि उन तीनोंमें और वे जिनके देवता हैं--ऐसे नेत्र, मन और वाणीमें वस्तुको प्रकाशित करनेकी जो कुछ भी शक्ति है--वह मेरे ही तेजका एक अंश है। इसीलिये छठे श्लोकमें भगवानने कहा है कि सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि--ये सब मेरे स्वरूपको प्रकाशित करनेमें समर्थ नहीं हैं। ४. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस पृथ्वीमें जो भूतोंको धारण करनेकी शक्ति प्रतीत होती है तथा इसी प्रकार और किसीमें जो धारण करनेकी शक्ति है, वह वास्तवमें उसकी नहीं, मेरी ही शक्तिका एक अंश है। अतएव मैं स्वयं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपने बलसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ। ५. “ओषधि:' शब्द पत्र, पुष्प और फल आदि समस्त अंग-प्रत्यंगोंके सहित वृक्ष, लता और तृण आदि जिनके भेद हैं--ऐसी समस्त वनस्पतियोंका वाचक है तथा “मैं ही चन्द्रमा बनकर समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ इससे भगवानने यह दिखलाया है कि जिस प्रकार चन्द्रमामें प्रकाशनशक्ति मेरे ही प्रकाशका अंश है, उसी प्रकार जो उसमें पोषण करनेकी शक्ति है, वह भी मेरी ही शक्तिका एक अंश है; अतएव मैं ही चन्द्रमाके रूपमें प्रकट होकर सबका पोषण करता हूँ। ६. यहाँ भगवान् यह बतला रहे हैं कि जिस प्रकार अग्निकी प्रकाशनशक्ति मेरे ही तेजका अंश है, उसी प्रकार उसका जो उष्णत्व है अर्थात् उसकी जो पाचन, दीपन करनेकी शक्ति है, वह भी मेरी ही शक्तिका अंश है। अतएव मैं ही प्राण और अपानसे संयुक्त प्राणियोंके शरीरमें निवास करनेवाले वैश्वानर अग्निके रूपमें भक्ष्य, भोज्य, लेह् और चोष्य पदार्थोंको अर्थात् दाँतोंसे चबाकर खाये जानेवाले रोटी, भात आदि; निगलकर खाये जानेवाले रबड़ी, दूध, पानी आदि; चाटकर खाये जानेवाले शहद, चटनी आदि और चूसकर खाये जानेवाले ऊख आदि--ऐसे चार प्रकारके भोजनको पचाता हूँ। $. पहले देखी-सुनी या किसी प्रकार भी अनुभव की हुई वस्तु या घटनादिके स्मरणका नाम “स्मृति” है। किसी भी वस्तुको यथार्थ जान लेनेकी शक्तिका नाम "ज्ञान है तथा संशय, विपर्यय आदि वितर्क-चालका वाचक “ऊहन' है और उसके दूर होनेका नाम “अपोहन' है। ये तीनों मुझसे ही होते हैं, यह कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि सबके हृदयमें स्थित मैं अन्तर्यामी परमेश्वर ही सब प्राणियोंके कर्मानुसार उपर्युक्त स्मृति, ज्ञान और अपोहन आदि भावोंको उनके अन्तःकरणमें उत्पन्न करता हूँ। २. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि वेदोंमें कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्डात्मक जितने भी वर्णन हैं, उन सबका अन्तिम लक्ष्य संसारमें वैराग्य उत्पन्न करके सब प्रकारके अधिकारियोंको मेरा ही ज्ञान करा देना है। अतएव उनके द्वारा जो मनुष्य मेरे स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करते हैं, वे ही वेदोंके अर्थको ठीक समझते हैं। इसके विपरीत जो लोग सांसारिक भोगोंमें फँसे रहते हैं, वे उनके अर्थकों ठीक नहीं समझते। 3. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि वेदोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधोंका वास्तविक समन्वय करके मनुष्यको शान्ति प्रदान करनेवाला मैं ही हूँ। ४. जिन दोनों तत्त्वोंका वर्णन गीताके सातवें अध्यायमें 'अपरा” और “परा' प्रकृतिके नामसे (७।४, ५), आठवें अध्यायमें 'अधिभूत” और “अध्यात्म” के नामसे (८।४, ३), तेरहवें अध्यायमें 'क्षेत्र” और '“क्षेत्रज्" के नामसे (१३।१) और इस अध्यायमें पहले “अश्वत्थ” और “जीव” के नामसे किया गया है, उनमेंसे एकको क्ष” और दूसरेको “अक्षर कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि दोनों परस्पर अत्यन्त विलक्षण हैं; क्योंकि 'भूतानि” पद यहाँ समस्त जीवोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण--तीनों प्रकारके शरीरोंका वाचक है और “कूटस्थ' शब्द यहाँ समस्त शरीरोंमें रहनेवाले आत्माका वाचक है। यह सदा एक-सा रहता है, इसमें परिवर्तन नहीं होता; इसलिये इसे “कूटस्थ” कहते हैं और इसका कभी किसी अवस्थामें क्षय, नाश या अभाव नहीं होता; इसलिये यह अक्षर है। ५. “उत्तम पुरुष' नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वशक्तिमान्, परमदयालु, सर्वगुणसम्पन्न पुरुषोत्तम भगवान्का वाचक है, वह पूर्वोक्त क्षर और अक्षर दोनों पुरुषोंसे विलक्षण और अत्यन्त श्रेष्ठ है। ६. जो तीनों लोकोंमें प्रविष्ट रहकर उनके नाश होनेपर भी कभी नष्ट नहीं होता, सदा ही निर्विकार, एकरस रहता है तथा जो क्षर और अक्षर--इन दोनोंका नियामक और स्वामी तथा सर्वशक्तिमान् ईश्वर है एवं जो गुणातीत, शुद्ध और सबका आत्मा है--वही परमात्मा पुरुषोत्तम” है। क्षर, अक्षर और ईश्वर--इन तीनों तत्त्वोंका वर्णन श्वैताश्वतरोपनिषद्में इस प्रकार आया है-- क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर: क्षरात्मानावीशते देव एक: । (१।१०) “प्रधान यानी प्रकृतिका नाम क्षर है और उसके भोक्ता अविनाशी आत्माका नाम अक्षर है। प्रकृति और आत्मा--इन दोनोंका शासन एक देव (पुरुषोत्तम) करता है।' ३. अपनेको “क्षर' पुरुषसे अतीत बतलाकर भगवानने यह दिखलाया है कि मैं क्षर पुरुषसे सर्वथा सबन्धरहित और अतीत हूँ। अक्षरसे अपनेको उत्तम बतलाकर यह भाव दिखलाया है कि क्षर पुरुषकी भाँति अक्षरसे मैं अतीत तो नहीं हूँ; क्योंकि वह मेरा ही अंश होनेके कारण अविनाशी और चेतन है; किंतु उससे मैं उत्तम अवश्य हूँ; क्योंकि वह अलपज्ञ है, मैं सर्वज्ञ हूँ; वह नियम्य है, मैं नियामक हूँ; वह मेरा उपासक है, मैं उसका स्वामी उपास्यदेव हूँ और वह अल्पशक्तिसम्पन्न है, मैं सर्वशक्तिमान् हूँ; अतएव उसकी अपेक्षा मैं सब प्रकारसे उत्तम हूँ। २. जिसका ज्ञान संशय, विपर्यय आदि दोषोंसे शून्य हो, जिसमें मोहका जरा भी अंश न हो, उसे “असम्मूढ” कहते हैं। 3. इस अध्यायमें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम--इस प्रकार तीन भागोंमें विभक्त करके समस्त पदार्थोंका वर्णन किया गया है। अतएव जो क्षर और अक्षर दोनोंके यथार्थ स्वरूपको समझकर उनसे भी अत्यन्त उत्तम पुरुषोत्तमके तत्त्वको जानता है, वही “सर्वविद्" है। ४. इस कथनसे भगवानने यह बतलाया है कि मुझ सर्वशक्तिमान्ू, सर्वाधार, समस्त जगत्का सृजन, पालन और संहार आदि करनेवाले, सबके परम सुहृद् सबके एकमात्र नियन्ता, सर्वगुणसम्पन्न, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापी परमेश्वरको उपर्युक्त दो श्लोकोंमें वर्णित प्रकारसे क्षर और अक्षर दोनों पुरुषोंसे उत्तम निर्गुण-सगुण--गुणातीत और सर्वगुणसम्पन्न साकार-निराकार, व्यक्ताव्यक्तस्वरूप परम पुरुष मान लेना ही मुझको “पुरुषोत्तम” जानना है। ५. भगवान्को पुरुषोत्तम समझनेवाले पुरुषका जो समस्त जगत्से प्रेम हटाकर केवलमात्र परम प्रेमास्पद एक परमेश्वरमें ही पूर्ण प्रेम करना; एवं बुद्धिसे भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्य, लीला, स्वरूप और महिमापर पूर्ण विश्वास करना; उनके नाम, गुण, प्रभाव, चरित्र और स्वरूप आदिका श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मनसे चिन्तन करना, कानोंसे श्रवण करना, वाणीसे कीर्तन करना, नेत्रोंसे दर्शन करना एवं उनकी आज्ञाके अनुसार सब कुछ उनका समझकर तथा सबमें उनको व्याप्त समझकर कर्तव्यकर्मोद्वारा सबको सुख पहुँचाते हुए उनकी सेवा आदि करना है--यही भगवान्को सब प्रकारसे भजना है। ६. इसे गुह्मतम बतलाकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस अध्यायमें मुझ सगुण परमेश्वरके गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यकी बात प्रधानतासे कही गयी है; इसलिये यह अतिशय गुप्त रखनेयोग्य है। मैं हर किसीके सामने इस प्रकारसे अपने गुण, प्रभाव, तत्त्व और ऐश्वर्यकी प्रकट नहीं करता; अतएव तुम्हें भी अपात्रके सामने इस रहस्यको नहीं कहना चाहिये। ७. भगवानने अर्जुनको यहाँ “अनघ' नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाया है कि तुम्हारे अंदर पाप नहीं है, तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध और निर्मल है, अतः तुम मेरे इस गुह्मतम उपदेशको सुनने और धारण करनेके पात्र हो। ३. इस अध्यायमें वर्णित भगवानके गुण, प्रभाव, तत्व और स्वरूप आदिको भलीभाँति समझकर भगवानको पूर्वोक्त प्रकारसे साक्षात् पुरुषोत्तम समझ लेना ही इस शास्त्रको तत्त्वसे जानना है तथा उसे जाननेवालेका जो उस पुरुषोत्तम भगवानको अपरोक्षभावसे प्राप्त कर लेना है, यही उसका बुद्धिमान् अर्थात् ज्ञानवान् हो जाना है और समस्त कर्तव्योंको पूर्ण कर चुकना--सबके फलको प्राप्त हो जाना ही कृतकृत्य हो जाना है। चत्वारिंशो< ध्याय: (श्रीमद्भधगवद्गीतायां षोडशो<ध्याय:) फलसहित दैवी और आसुरी सम्पदाका वर्णन तथा शास्त्रविपरीत आचरणोंको त्यागने और शास्त्रके अनुकूल आचरण करनेके लिये प्रेरणा सम्बन्ध-- गीताके सातवें अध्यायके पंद्रहवें *लोकमें तथा नवें अध्यायके ग्यारहवें और बारहवें श्लोकोंमें भगवान्ने कहा था कि 'आयुरी और राक्षसी प्रकृतिको धारण करनेवाले मृढ मेरा भजन नहीं करते, वर॑ं मेरा तिरस्कार करते हैं" तथा नवें अध्यायके तेरहवें और चौदहवें श्लोकोंमें कहा कि दैवी प्रकृतिये युक्त महात्माजन मुझे सब भ्रूतोंका आदि और अविनाशी समझकर अनन्यप्रेमके साथ सब प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं।” परंतु दूसरा प्रसंग चलता रहनेके कारण वहाँ दैवी प्रकृति और आयुरी प्रकृतिके लक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सका। फिर पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो ज्ञानी महात्मा मुझे पुरुषोत्तम” जानते हैं. वे सब प्रकारसे मेरा भजन करते हैं।” इसपर स्वाभाविक ही भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सर्वभावसें उनका भजन करनेवाले दैवी प्रकृतियुक्त महात्मा पुरुषोंके और उनका भजन न करनेवाले आयुरी प्रकृतियुक्त अज्ञानी मनुष्योंके क्या-क्या लक्षण हैं--यह जाननेकी इच्छा होती है। अतएव अब भगवान् दोनोंके लक्षण और स्वभावका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये सोलहवाँ अध्याय आरम्भ करते हैं। इसमें पहले तीन श*लोकोॉरद्वारा दैवी-सम्पद्से युक्त सात्विक पुरुषोंके स्वाभाविक लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है-- श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिरज्ञानयोगव्यवस्थिति: । दान॑ दमश्न यज्ञश्न स्वाध्यायस्तपः आर्जवम्,श्रीभगवान् बोले--भयका सर्वथा अभाव, अन्तःकरणकी पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगमें निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियोंका दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनोंकी पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मोंका आचरण एवं वेद-शास्त्रोंका पठन-पाठन तथा भगवानके नाम और गुणोंका कीर्तन, स्वधर्मपालनके लिये कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणकी सरलता
arjuna uvāca
Arjuna said: (The verse heading indicates that Arjuna is the speaker at this point.)
अजुन उवाच
This line itself does not state a doctrine; it functions as a speech-introduction marker, signaling that the next statement is spoken by Arjuna.
The narration shifts to Arjuna’s voice; the text is about to present Arjuna’s question or response within the ongoing instruction.