Adhyāya 41 — Yudhiṣṭhira’s Gurv-anumati and Strategic Counsel (युधिष्ठिरस्य गुर्वनुमतिः)
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् | सुखसज्ञेन बध्नाति ज्ञानसड्रेन चानघ,हे निष्पाप! उन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण तो निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और विकाररहित हैः, वह सुखके सम्बन्धसे और ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे बाँधता हैः
अजुन उवाच