जमदग्निर्वाच साक्षाद् दृष्टोड$सि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वर: । न त्वयापकृतं मेडद्य न च मे मन्युरस्ति वै,जमदग्नि बोले--क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है। तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अत: आज तुमपर मेरा रोष नहीं है
वैशम्पायन उवाच