जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठ॑ कि कुर्याद् विप्रिये कृते । इति संचिन्त्य धर्म: स धर्षयामास तत् पय:,धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया
वैशम्पायन उवाच