Nakula’s Declaration and the Uñchavṛtti Brāhmaṇa’s Superior Merit (Āśvamedhika Parva, Adhyāya 92)
यज्ञं दीक्षां तथा होमान् यच्चान्यन्मृगयामहे । न्यायेनोपार्जिताहारा: स्वकर्माभिरता वयम्,यज्ञ, दीक्षा, होम तथा और जो कुछ हम खोजा करते हैं, वह सब हमें यहाँ प्राप्त है। न्यायसे उपार्जित किया हुआ अन्न ही हमारा भोजन है और हम सदा अपने कर्मोमें लगे रहते हैं
वैशम्पायन उवाच