इत्येतद्वचनाद् राजा विज्ञाप्यो मम मानद । यथा चात्ययिकं न स्याद् यदर्घ्याहरणे5भवत्,(“इतना कहकर वे फिर मुझसे बोले--) “मानद! मेरी ओरसे तुम राजा युधिष्ठिरको यह सूचित कर देना कि राजसूय-यज्ञमें अर्घ्य देते समय जो दुर्घटना हो गयी थी, वैसी इस बार नहीं होनी चाहिये
वैशम्पायन उवाच