Adhyāya 51: Kṛṣṇa’s Leave-Taking and Departure for Dvārakā (द्वारकागमनानुमति)
आयोज्य सर्वसंस्कारान् संयम्यात्मानमात्मनि | स तद् ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद् भूयो न विद्यते,जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है
वायुदेव उवाच