Brahmopadeśa on Saṃnyāsa, Tapas, and Jñāna (ब्रह्मोपदेशः—संन्यासतपोज्ञानविमर्शः)
ज्ञानेन तपसा चैव धीरा: पश्यन्ति तत् परम् । वह वेदविद्याका आधार ब्रह्म (अज्ञानियोंके लिये) अत्यन्त दूर है। वह निर्द्धन्द्, निर्गुण, नित्य, अचिन्त्य गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ है। धीर पुरुष ज्ञान और तपस्याके द्वारा उस परमात्माका साक्षात्कार करते हैं
वायुदेव उवाच