अध्याय ५७ — राजोपरिचरवसोः धर्मोपदेशः, सत्यवत्याः उत्पत्तिः, व्यासजन्म च
Adhyāya 57: Indra’s Counsel to King Vasu; Origin of Satyavatī; Birth of Vyāsa
कीर्त्यमानान् मया ब्रह्म॒न् वातवेगान् विषोल्बणान् । शड्कुकर्ण: पिठरक: कुठारमुखसेचकौ,ब्रह्मन! अब धृतराष्ट्रके कुलमें उत्पन्न नागोंके नामोंका मुझसे यथावत् वर्णन सुनो। वे वायुके समान वेगशाली और अत्यन्त विषैले थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं--) शंकुकर्ण, पिठरक, कुठार, मुखसेचक, पूर्णांगद, पूर्णमुख, प्रहास, शकुनि, दरि, अमाहठ, कामठक, सुषेण, मानस, अव्यय, भैरव, मुण्डवेदांग, पिशंग, उद्रपारक, ऋषभ, वेगवान् नाग, पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारंग, समृद्ध, पटवासक, वराहक, वीरणक, सुचित्र, चित्रवेगिक, पराशर, तरुणक, मणि, स्कन््ध और आरुणि--([ये सभी धूृतराष्ट्रवंशी नाग सर्पसत्रकी आगमें जलकर भस्म हो गये थे।) ब्रह्मन! इस प्रकार मैंने अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले मुख्य-मुख्य नागोंका वर्णन किया है। उनकी संख्या बहुत है, इसलिये सबका नामोल्लेख नहीं किया गया है। इन सबकी संतानोंकी और संतानोंकी संततिकी, जो प्रज्वलित अग्निमें जल मरी थीं, गणना नहीं की जा सकती। किसीके तीन सिर थे तो किसीके सात तथा कितने ही दस-दस सिरवाले नाग थे
kīrtyamānān mayā brahman vātavegān viṣolbaṇān | śaṅkukarṇaḥ piṭharakaḥ kuṭhāramukhasecakau ||
Śaunaka said: “O Brahmin, as I recount them, hear of those serpents—swift as the wind and exceedingly venomous—born in the lineage of Dhṛtarāṣṭra. (Among them were) Śaṅkukarṇa, Piṭharaka, Kuṭhāra, and Mukhasecaka.” The verse functions as an opening to a longer catalogue: it frames the Nāgas not merely as names, but as formidable beings whose inherited power and poison become morally charged in the wider context of the serpent-sacrifice narrative, where lineage, fame, and destruction are intertwined.
शौनक उवाच