Kuntī’s Appeal for Progeny and the Vyuṣitāśva–Bhadrā Precedent (कुन्ती-पाण्डु संवादः; व्युषिताश्व-भद्रा आख्यानम्)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ ३ श्लोक मिलाकर कुल ४४ ६ “लोक हैं) न्च्स्स्त्ािस्सि (9) £:ानप्ट् एकादशाधिकशततमोड< ध्याय: कुन्तीद्वारा स्वयंवरमें पाण्डुका वरण और उनके साथ विवाह वैशम्पायन उवाच सत्त्वरूपगुणोपेता धर्मारामा महाव्रता । दुहिता कुन्तिभोजस्य पृथा पृुथुललोचना,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा कुन्तिभोजकी पुत्री विशाल नेत्रोंवाली पृथा धर्म, सुन्दर रूप तथा उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी। वह एकमात्र धर्ममें ही रत रहनेवाली और महान् व्रतोंका पालन करनेवाली थी
vaiśampāyana uvāca | sattvarūpaguṇopetā dharmārāmā mahāvratā | duhitā kuntibhojasya pṛthā pṛthulalocanā ||
Vaiśampāyana said: Janamejaya, Kuntibhoja’s daughter Pṛthā—wide-eyed, endowed with a noble disposition, beauty, and excellent qualities—was devoted to dharma alone and steadfast in great vows.
वैशम्पायन उवाच