Śamī-vṛkṣe śastra-nidhāna and Entry into Virāṭa’s Capital (शमीवृक्षे शस्त्रनिधानम्)
शरीरं च मृतस्यैक॑ समबध्नन्त पाण्डवा: | विवर्जयिष्यन्ति नरा दूरादेव शमीमिमाम्,इसके बाद पाण्डवोंने एक मृतकका शव लाकर उस वृक्षकी शाखामें बाँध दिया। उसे बाँधनेका उद्देश्य यह था कि इसकी दुर्गन्ध नाकमें पड़ते ही लोग समझ लेंगे कि इसमें सड़ी लाश बँधी है; अतः दूरसे ही वे इस शमीवृक्षको त्याग देंगे। परंतप पाण्डव इस प्रकार उस शमीवृक्षपर शव बाँधकर उस वनमें गाय चरानेवाले-ग्वालों और भेड़ पालनेवाले गड़रियोंसे शव बाँधनेका कारण बताते हुए इस प्रकार कहते थे--“यह एक सौ अस्सी वर्षकी हमारी माता है। हमारे कुलका यह धर्म है, इसलिये ऐसा किया है। हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते आये हैं।'” इस प्रकार शत्रुओंका संहार करनेवाले वे कुन्तीपुत्र नगरके निकट आ पहुँचे
vaiśampāyana uvāca |
śarīraṃ ca mṛtasyāikaṃ samabadhnanta pāṇḍavāḥ |
vivarjayīṣyanti narā dūrād eva śamīm imām ||
Waiśampāyana berkata: Dengan maksud agar orang-orang menjauhi pohon śamī itu dari kejauhan, para Pāṇḍava mengikatkan satu mayat pada cabang pohon śamī tersebut.
वैशम्पायन उवाच