Nahuṣa Abhiṣeka and the Crisis of Restraint (नहुषाभिषेकः—दमभ्रंशः)
शृण्वन् दिव्या बहुविधा: कथा: श्रुतिमनोहरा: । वादित्राणि च सर्वाणि गीत॑ च मधुरस्वनम्,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे
śṛṇvan divyā bahuvidhāḥ kathāḥ śrutimanoharāḥ | vāditrāṇi ca sarvāṇi gītaṃ ca madhurasvanam ||
Ia mendengarkan banyak kisah ilahi yang memikat telinga dan hati; dan ia menikmati segala bunyi alat musik serta nyanyian yang dilagukan dengan suara manis.
शल्य उवाच