Prāyaścitta-vidhāna: Tapas, Dāna, Vrata, and Proportional Expiation (प्रायश्चित्तविधानम्)
ऑपि--मआफा 2 १. तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय वह खा लेना तथा तीन दिन उपवास करना--इस प्रकार बारह दिनका कृच्छुव्रत होता है। इसी क्रमसे छः वर्षतक रहनेसे ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन-तीन दिनमें परिवर्तित न होकर सम मासोंमें एक-एक सप्ताहमें और विषम मासोंमें आठ-आठ दिनोंमें बदलते हुए एक-एक मासके कृच्छृव्रतके अनुसार चले तो तीन वर्षोमें शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास प्रात:काल, एक मास सायंकाल और एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास--इस प्रकार चार-चार मासके कृच्छृव्रतके अनुसार चले तो एक ही वर्षमें ब्रह्महत्याका पाप छूट सकता है। २. श्रुति इस प्रकार है--“सर्व पाप्मानं तरति तरति ब्रह्महत्यां यो5श्वमेधेन यजते'। > गायके दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर--इन पाँच गव्य-पदार्थोंसे तथा मिट्टी, जल, राख, खटाई और आग--इन पाँच वस्तुओंसे पात्रको शुद्ध किया जाता है--यही उसका दस वस्तुओंसे शोधन है। षट्त्रिशो5्ध्याय: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन युधिछिर उवाच कि भक्ष्यं चाप्यभक्ष्यं च कि च देयं प्रशस्यते । किं च पात्रमपात्रं वा तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य? किस वस्तुका दान उत्तम माना जाता है? कौन दानका पात्र है अथवा कौन अपात्र? यह सब मुझे बताइये
yudhiṣṭhira uvāca |
bhakṣyaṃ cāpyabhakṣyaṃ ca kiṃ ca deyaṃ praśasyate |
kiṃ ca pātramapātraṃ vā tan me brūhi pitāmaha ||
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Kakek, jelaskan kepadaku: apa yang layak dimakan dan apa yang tidak; pemberian seperti apa yang dipuji sebagai utama; dan siapa yang pantas menerima sedekah serta siapa yang tidak.”
युधिछिर उवाच
The verse frames a dharma-inquiry: ethical life requires discernment about (1) permissible vs. forbidden consumption, (2) what kinds of giving are truly commendable, and (3) the moral qualifications that make a recipient worthy or unworthy of charity.
In the Śānti Parva’s instruction setting, Yudhiṣṭhira approaches the elder ‘Grandfather’ (Bhīṣma) for authoritative guidance on practical dharma—dietary propriety and the ethics of dāna—so that conduct after the war may be grounded in right judgment.