Adhyāya 180: Jīva, Śarīra, and the Fire Analogy (भृगु–भरद्वाज संवादः)
अरक्रा - एक गृहस्थके घरपर कुछ अतिथि आ गये। घरके सब लोग कहीं बाहर चले गये थे। भीतर केवल एक कुमारी कन्या थी, जिसपर उन अतिथियोंके भोजन आदिका भार आ पड़ा। वह उनके निमित्त रसोई बनानेके लिये धान कूटने लगी। उसके हाथोंमें शंखकी बनी हुई कई चूड़ियाँ थीं, जो धान कूटते समय खनखना उठीं। अतिथियोंको इस बातका पता न चल जाय; इसलिये एक-एक करके उसने चूड़ियाँ निकाल लीं, दोनों हाथोंमें केवल एक-एक चूड़ी ही शेष रह गयी; फिर उनका बजना बंद हो गया। इस तरह एकाकी रहनेका उपदेश देनेके कारण वह कुमारी गुरु हुई। एकोनाशीरत्याधिकशततमो< ध्याय: प्रह्माद और अवधूतका संवाद--आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा युधिछिर उवाच केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वीतशोकश्षरेन्महीम् । किज्च कुर्वन्नरो लोके प्राप्रोति गतिमुत्तमाम्,राजा युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! आप सदाचारके स्वरूपको जाननेवाले हैं। कृपया यह बताइये, किस तरहके आचारको अपनाकर मनुष्य शोकरहित हो इस पृथ्वीपर विचरण कर सकता है? और इस जगत्में कौन-सा कर्म करके वह उत्तम गति पा सकता है?
Yudhiṣṭhira uvāca: kena vṛttena vṛttajña vītaśokaś care(n) mahīm? kiñ ca kurvann naro loke prāpnoti gatim uttamām?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang mengetahui dharma perilaku, dengan cara hidup apakah seseorang dapat mengembara di bumi tanpa duka? Dan dengan melakukan apa di dunia ini manusia mencapai tujuan tertinggi?”
युधिछिर उवाच