Virūpākṣa’s Dāna and Gautama’s Burden — the approach of Rājadharma
सर्वातिशड्की पुरुषो बलीश: कृपणो5थवा । वर्गप्रशंसी सततमाश्रमद्वेषसंकरी,भीष्मजीने कहा--राजन्! जिसके मनमें बड़ी घृणित इच्छाएँ रहती हैं, जो हिंसाप्रधान कुत्सित कर्मोको आरम्भ करना चाहता है, स्वयं दूसरोंकी निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन््दा करते हैं, जो अपनेको दैवसे वज्चित समझता और पापमें प्रवृत्त होता है, दिये हुए दानका बारंबार बखान करता है, जिसके मनमें विषमता भरी रहती है, जो नीच कर्म करनेवाला, दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला और शठ है, भोग्य वस्तुओंको दूसरोंको दिये बिना ही अकेले भोगता है, जिसके भीतर अभिमान भरा हुआ है, जो विषयोंमें आसक्त और अपनी प्रशंसाके लिये व्यर्थ ही बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाला है, जिसके मनमें सबके प्रति संदेह बना रहता है, जो कौएकी तरह वंचक दृष्टि रखनेवाला है, जिसमें कृपणता कूट- कूटकर भरी है, जो अपने ही वर्गके लोगोंकी प्रशंसा करता, सदा आश्रमोंसे द्वेष रखता और वर्णसंकरता फैलाता है, सदा हिंसाके लिये ही जिसका घूमना-फिरना होता है, जो गुणको भी अवगुणके समान समझता और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मनमें उदारता नहीं है और जो अत्यन्त लोभी है, ऐसा मनुष्य ही नृशंस कर्म करनेवाला कहा गया है
sarvātiśaṅkī puruṣo balīśaḥ kṛpaṇo ’thavā | varga-praśaṁsī satatam āśrama-dveṣa-saṅkarī ||
Bhīṣma berkata: “Wahai Raja, orang yang dilalap kecurigaan berlebihan—bodoh dan kikir—yang terus-menerus memuji hanya kelompoknya sendiri, memendam kebencian terhadap āśrama (tata laku hidup yang tertib), dan mendorong kekacauan serta percampuran sosial yang merusak tatanan: dialah yang patut dikenali sebagai pribadi yang condong pada kekejaman dan kelaliman.”
भीष्म उवाच