Draupadī’s Exhortation on Rājadharma and Daṇḍa (द्रौपद्याः राजधर्मोपदेशः)
कथं द्वैतवने राजन् पूर्वमुक्त्वा तथा वच: । भ्रातृनेतान् सम सहितान् शीतवातातपार्दितान्,राजन! द्वैतवनमें ये सभी भाई जब आपके साथ सर्दी-गर्मी और आँधी-पानीका कष्ट भोग रहे थे, उन दिनों आपने इन्हें धैर्य देते हुए कहा था--'शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर बन्धुओ! विजयकी इच्छावाले हमलोग युद्धमें दुर्योधनको मारकर रथियोंको रथहीन करके बड़े-बड़े हाथियोंका वध कर डालेंगे और घुड़सवारसहित रथोंसे इस पृथ्वीको पाट देंगे। तत्पश्चात् सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न वसुधाका उपभोग करेंगे। उस समय पर्याप्त दान- दक्षिणावाले नाना प्रकारके समृद्धिशाली यज्ञोंके द्वारा भगवान्की आराधनामें लगे रहनेसे तुमलोगोंका यह वनवासजनित दुःख सुखरूपमें परिणत हो जायगा।' धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! वीर महाराज! पहले द्वैतवनमें इन भाइयोंसे स्वयं ही ऐसी बातें कहकर आज क्यों आप फिर हमलोगोंका दिल तोड़ रहे हैं
kathaṃ dvaitavane rājan pūrvam uktvā tathā vacaḥ | bhrātṝn etān samāṃ sahitān śītavātātapārditān |
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, bagaimana mungkin—setelah dahulu mengucapkan kata-kata demikian di hutan Dvaitavana, ketika saudara-saudara ini bersatu bersamamu dan tersiksa oleh dingin, angin, serta panas—kini engkau berbicara dengan cara yang mematahkan keteguhan mereka?”
वैशम्पायन उवाच