नारदेन दिव्यसभाः कथितुं प्रतिज्ञा
Nārada’s Prelude to Describing the Divine Assemblies
सभां तु पितराजस्य वरुणस्य च धीमतः । कथयिष्ये तथेन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
sabhāṃ tu pitarājasya varuṇasya ca dhīmataḥ | kathayiṣye tathendrasya kailāsanilayasya ca ||
Narada berkata: “Aku akan mengisahkan balairung sidang milik Yama, raja para Pitri; milik Varuna yang bijaksana; demikian pula milik Indra; dan juga milik penguasa yang bersemayam di Kailasa (Kubera).”
नारद उवाच