दिव्याश्ष वाच: सहसा बभूतवु- दिव्यानि पुष्पाण्यथ सिंहनादा: । तस्मिंस्तथा वै धरणीं निमग्ने रथे प्रयत्नान्मधुसूदनस्थ,उस प्रज्वलित बाणको बड़े वेगसे आते देख भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें खेल-सा करते हुए अपने उत्तम रथको तुरंत ही पैरसे दबाकर उसके पहियोंका कुछ भाग पृथ्वीमें धँसा दिया। साथ ही सोनेके साज-बाजसे ढके हुए चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेतवर्णवाले उनके घोड़े भी धरतीपर घुटने टेककर झुक गये। उस समय आकाशमें सब ओर महान् कोलाहल गूँज उठा। भगवान् मधुसूदनकी स्तुति-प्रशंसाके लिये कहे गये दिव्य वचन सहसा सुनायी देने लगे। श्रीमधुसूदनके प्रयत्नसे उस रथके धरतीमें धँस जानेपर भगवान्के ऊपर दिव्यपुष्पोंकी वर्षा होने लगी और दिव्य सिंहनाद भी प्रकट होने लगे
sañjaya uvāca | sahasā babhūvur divyā vācaḥ, divyāni puṣpāṇy atha siṃhanādāḥ | tasmiṃs tathā vai dharaṇīṃ nimagne rathe prayatnān madhusūdana-sthe ||
Sañjaya berkata: Seketika terdengar ujaran-ujaran surgawi; bunga-bunga ilahi berjatuhan, dan raungan singa dari kahyangan menggema. Sebab, oleh upaya Madhusūdana, kereta itu telah merendah dan seakan tenggelam ke dalam bumi.
संजय उवाच